The Kon-Tiki blog

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Thursday, June 01, 2006

पहचान ...

पहचान
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अपनी कई ,अपनी महबूबा
अपनी आशिक़ि अपना वजूद
अपना तोहफा,अपना कफ़न
अपना देश, अपना वतन

ओढ़नी में एक बच्चे की मौत
ओढ़नी में इक शादी का खौफ्फ़
ओढ़नी में एक वजूद की मौत
ओढ़नी में … मेरी मौत

झाँक कर देखो एक झलकी
ख्वाबों का एक सुर्ख झूला
गोलियों से रंगीन…. लाल
एक दो तीन .. चुनते हुए

गोलियां चुनती हुई
और उनके अफ़सोस का क्या
कहाँ तक जाएँगी
अगर कोई नहीं मिला तो

रंगीन गलियों का हिजाब
की टेहेलते हुए लम्हों का हिसाब
एक दो तीन कह कर ,निकल कर
खामोशी का हिसाब पूछ कर

गोलियाँ चीर कर कहती है
पूछती है क्या यह जान है
की अगर खून का हिसाब है
तो जांच कर लो, जांच कर लो

खून देख लो, मेरा खून देख लो
लाल है ,अगर नहीं है तो मुस्सल्मान होगा
अगर नहीं है तो हिंदू होगा
मगर जो भी है लाल होगा

बहता हुआ सरफिरों के सर से
इक अक्षर बनता हुआ
ॐ होगा ? मेरा नाम होगा ?
जूनून होगा ? मेरा देश होगा?